गजल
जितनी गरज थी उतना बरसा नहीं है पानी,
इस बार भी नदी में उतरा नहीं है पानी,
बरसा तो, इतना बरसा ये हाल हुआ घर का ,
टूटे हुए छतों में रूकता नहीं है पानी,
पानी में जहर इतना नदियों के मिल चुका है,
जैसी थी शक्ल वैसा दिखता नहीं है पानी,
साजिश दिलों में नफरत की आग है आँखों में,
ऑखों में मोहब्बत का दिखता नहीं है पानी ।
मौसम के खुशनुमा हर लम्हे का घूट पी लो,
मुट्ठी में हन पलों का रूकता नहीं है पानी।
यह ब्लॉग समर्पित है उन लोगों को जिन्हें अपनी राजभाषा हिन्दी से प्रेम है तथा तमाम कठिनाइयों के बावजूद भी उसकी प्रगति के लिए प्रयासरत है। जय हिन्द , जय भारत।
दूरभाष - 07175-254253 लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
दूरभाष - 07175-254253 लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सोमवार, 20 अप्रैल 2009
गजल
गजल
जितनी गरज थी उतना बरसा नहीं है पानी,
इस बार भी नदी में उतरा नहीं है पानी,
बरसा तो, इतना बरसा ये हाल हुआ घर का ,
टूटे हुए छतों में रूकता नहीं है पानी,
पानी में जहर इतना नदियों के मिल चुका है,
जैसी थी शक्ल वैसा दिखता नहीं है पानी,
साजिश दिलों में नफरत की आग है आँखों में,
ऑखों में मोहब्बत का दिखता नहीं है पानी ।
मौसम के खुशनुमा हर लम्हे का घूट पी लो,
मुट्ठी में हन पलों का रूकता नहीं है पानी।
जितनी गरज थी उतना बरसा नहीं है पानी,
इस बार भी नदी में उतरा नहीं है पानी,
बरसा तो, इतना बरसा ये हाल हुआ घर का ,
टूटे हुए छतों में रूकता नहीं है पानी,
पानी में जहर इतना नदियों के मिल चुका है,
जैसी थी शक्ल वैसा दिखता नहीं है पानी,
साजिश दिलों में नफरत की आग है आँखों में,
ऑखों में मोहब्बत का दिखता नहीं है पानी ।
मौसम के खुशनुमा हर लम्हे का घूट पी लो,
मुट्ठी में हन पलों का रूकता नहीं है पानी।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)