लड़ाई
लड़ाई चाहे जैसी भी हो,
लेकिन उसका मकसद ,
उन करोड़ों लोगों की ,
पीठ से चिपके हुए पेट के लिए,
रोटी पहुँचाने का होना चाहिए।
यह मकसद तपती हुई दोपहरी में ,
दो घुट पानी के लिए मिलों सफर तय करने ,
वालों के लिए पानी पहुँचाने का होना चाहिए।
पगडंडियों से गुजरती हुई उन अंधेरी ,
झुगी झोपड़ियों तक रोशनी पहुॅुचाने वाली होनी चाहिए।
माचिस की तिलियाँ बनाती,
बीड़ी के पत्तियों को लपेटती हुई,
उन मासूम कोमल-कोमल
उंगलियों में स्कूल की किताबें रखने का होना चाहिए।
धूप,बारिश की मार सहते हुए ,
फुटपाथ पर सपने बिछा कर सोने वालों के लिए
छत मुहय्या करने का होना चाहिए।
अमूमन हमारी सारी लड़ाइयाँ,मंदिरों,
मस्जिद और गिरजाघरों की दिवारों से टकराकर लौट आती हैं
या रामरथ के पहियों में उलझकर रह जाती हैं
या धारा 370 के तेज बहाव में बहकर रह जाती हैं।
या मैच फिक्सिंग के सवालों और जवाबों के ढेर के नीचे दबकर रह जाती हैं।
और अन्त में किसी पागल कुत्ते की तरह हाँफते हुए गिरकर दम तोड़ देती हैं।
आइए, हम कुछ ऐसी लड़ाइयाँ तय करें,
जिनका मकसद कागजों से नदियों को उतारकर,
प्यासे घरों तक पहुँचाने का हो।
लहलहाती हुई फसलों को भूखे घरों तक पहुॅचाने का हो।
करोड़ों भूखे,नगें और बेघरों को,
मुद्दत्तें से हमारी इन्हीं लड।ाइयों का
इन्तजार है ! इन्तजार है ! इन्तजार है !