सपनीली नींद सो जाओगे
क्या सुनाऊ तुम्हें,
इस दास्तान में अश्क का समुंदर है!
सह न पाओगे तुम ,
मेरे दिल में आज दर्द का समुंदर है!
कल तक जिस लाल को ,
अपने कलेजे से लगाया रहा
आज उसी को मरघट तक,
अपना कांधा लगाता रहा।
जब न मिला दो गज कफन भी,
उस बदनसीब के लिए,
माँ ने फाड़ा आंचल,
रोकर उस दिल फरेब के लिए ।
जीते जी न पाया और,
अब वो माँ का आंचल ओढ़ रहा,
उस पत्थर दिल ने रूठ के
आज हमसे अपना मुँह मोड़ा है।
अश्क माँ के बहते रहे,
मुझसे वो कहते रहे,
हमारे बहने का हिसाब लो,
समाज से इसका जवाब लो।
ऐसा क्यों होता है,
सेठ का कुत्ता,मखमल पर सोता है,
गरीब का ब्च्चा,ठंड में ठिठुरते रोता है।
वो बिस्कुट सूंघकर छोड़ देता है,और गरीब लपककर उसे उठा लेता है।
क्या है जवाब इसका ,तुम्हारे पास,
एक हिस्से तीस दिन,
दूजा सोए उदास।
क्या तुम भी कुछ कहोगे "सदा"
और अपने नर्म-नर्म लिहाफ में चैन की,
सपनीली नींद सो जाओगे।
नींद सो जाओगे ............।
यह ब्लॉग समर्पित है उन लोगों को जिन्हें अपनी राजभाषा हिन्दी से प्रेम है तथा तमाम कठिनाइयों के बावजूद भी उसकी प्रगति के लिए प्रयासरत है। जय हिन्द , जय भारत।
श्री सदानंद गुप्ता "सदा" (आवास) 07175- 254580 (एम.) 098813493134 लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
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सोमवार, 20 अप्रैल 2009
खुशियाँ और दर्द
खुशियाँ और दर्द
कुरेद कर जख्म उसके , हर बार मैं रूलाता रहा।
वो दुखते जख्मों पे मेरे,मरहम लगाता रहा॥
चोट खया आज फूलों से मेरा हबीब।
दामन वो अपना, काँटों से बचाता रहा॥
दिखाई नई रोशनी,हर पल मुझे।
मेरे अंधेरे कों वो,अपना बनाता रहा॥
भर दी झोली जिसने ,मुस्कुराहटों से मेरी।
उसी की खुशियों को मैं,कांधा लगाता रहा॥
ख्वाब में भी जिसने,न दिया दर्द कभी मुझे।
उसे ताज कांटों का मैं, "सदा" पहनाता रहा॥
कुरेद कर जख्म उसके , हर बार मैं रूलाता रहा।
वो दुखते जख्मों पे मेरे,मरहम लगाता रहा॥
चोट खया आज फूलों से मेरा हबीब।
दामन वो अपना, काँटों से बचाता रहा॥
दिखाई नई रोशनी,हर पल मुझे।
मेरे अंधेरे कों वो,अपना बनाता रहा॥
भर दी झोली जिसने ,मुस्कुराहटों से मेरी।
उसी की खुशियों को मैं,कांधा लगाता रहा॥
ख्वाब में भी जिसने,न दिया दर्द कभी मुझे।
उसे ताज कांटों का मैं, "सदा" पहनाता रहा॥
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