श्री एम.श्रीराम लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
श्री एम.श्रीराम लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 20 अप्रैल 2009

गजल

गजल

हाथों में ऊठा मिट्टी,
माथे से लगाᅠमिट्टी,
होगी कभी न तुझसे ,
ता उम जुदा मिट्टी।
जिसका गरूर ऊँचा,
तू उसको दिखा मिट्टी।
की सरहदों हर दम
मिट्टी से जुदा मिट्टी।
गुजरी है भीड़ उसकी,
कंधे पे ऊठा मिट्टी।

गजल

गजल


जिसका ख्याल रोटी,
उसका सवाल रोटी।
भूखों से ही कराती ,
क्या-क्या कमाल रोटी।
इंसानियत के रिश्ते
करती हलाल रोटी।
वादों का मैं करूँ क्या ,
झाेली में डाल रोटी।
हिन्दु रखे न मुस्लिम,
रखती ख्याल रोटी।

गजल

गजल

जितनी गरज थी उतना बरसा नहीं है पानी,
इस बार भी नदी में उतरा नहीं है पानी,
बरसा तो, इतना बरसा ये हाल हुआ घर का ,
टूटे हुए छतों में रूकता नहीं है पानी,
पानी में जहर इतना नदियों के मिल चुका है,
जैसी थी शक्ल वैसा दिखता नहीं है पानी,
साजिश दिलों में नफरत की आग है आँखों में,
ऑखों में मोहब्बत का दिखता नहीं है पानी ।
मौसम के खुशनुमा हर लम्हे का घूट पी लो,
मुट्ठी में हन पलों का रूकता नहीं है पानी।

गजल

गजल

जितनी गरज थी उतना बरसा नहीं है पानी,
इस बार भी नदी में उतरा नहीं है पानी,
बरसा तो, इतना बरसा ये हाल हुआ घर का ,
टूटे हुए छतों में रूकता नहीं है पानी,
पानी में जहर इतना नदियों के मिल चुका है,
जैसी थी शक्ल वैसा दिखता नहीं है पानी,
साजिश दिलों में नफरत की आग है आँखों में,
ऑखों में मोहब्बत का दिखता नहीं है पानी ।
मौसम के खुशनुमा हर लम्हे का घूट पी लो,
मुट्ठी में हन पलों का रूकता नहीं है पानी।