बुधवार, 22 अप्रैल 2009

हिन्दी हमारा राष्ट्रभाषा होता !

हिन्दी हमारा राष्ट्रभाषा होता !

बात उन दिनों कि है जब मैनें कॉलेज की पढाई समाप्त होने के पश्‍चात नौकरी के लिए कई सरकारी तथा गैर - सरकारी विभागों में आवेदन करना तथा प्रतियोगिता परीक्षा देना प्रारंभ किया था । चूँकी अभी-अभी कॉलेज से निकला था, तो प्रतियोगिता में शामिल होना मतलब खूब मौज-मस्ती तथा नये-नये शहरों में घूमना-फिरना ही समझता था। अब तक मेरा संबंध धनबाद जैसे एक छोटे से शहर से था अतः आरम्भ से इच्छा यही हुआ करती की बडे. शहरों को करीब से देखे-जाने व समझें ।

इसी प्रकार एक बार कुछ मित्रों के साथ सिकंदराबाद जाने का अवसर प्राप्त हुआ या यों कहिये की हम सब मित्र्रों नें योजना बनाकर ही सिकंदराबाद रेलवे भर्ती बोर्ड में टिकट निरीक्षक के पद के लिए आवेदन किया जिससे परीक्षा के नाम पर हैदराबाद-सिकदराबाद जुडवा शहर को देखने का अवसर मिल सके । परीक्षा का बुलावा पत्र आते ही हम सबने चेन्नई के लिये फलकनामा एक्‍सप्रेस की टिकटें रिजर्व करावा लिया तथा जाने की तैयारी शुरू कर दी । चूँकी हम सभी का मकसद परीक्षा देने से ज्यादा मौज-मस्ती करना था , अत : हम लोग चेन्नई दो दिन पहले ही पहुंच गये । चेन्नई रेल्वे स्टेशन के पास के ही एक सस्ते लॉज में दो कमरें किराये पर लिया तथा स्नानादि कर यात्रा की थकान मिटाया और शाम होते लॉज के मैनेजर से टूटी-फूटी अंगे्रजी भाषा का प्रयोग कर नगर भ्रमण का प्लान बनाया । इसी संदर्भ हम लोग एक ट्रैवेल एजेंसी से अगले दिन शहर घूमनें के लिये पॉंच टिकट बूक करा लिये। इस शहर में हमें बहुत कम ही लोग ऐसे मिले जिनसे स्तरीय हिन्दी में बात किया जा सकता था। भाषा की कठिनाई के बावजूद हम लोग नगर भ्रमण का लोभ नहीं सवर कर पा रहे थे। थोडी-बहुत कठिनाइयों के साथ हिन्दी-ईगलिश्‍ा या यों कहें हिंगलिश्‍ा का प्रयोग कर हमारा काम निकल रहा था ।

ट्रैवेल एजेंट हमें बारम्बार यह हिदायत दे रहा था की यदि हमनें देर की तो वो निर्धारित समय के बाद हमें छोड कर चला जायेगा और हमारा किराया भी वापस नहीं करेगा, आदतन देर तक सोकर उठने की परंपरा को छोड. हम सभी मित्र जल्दी-जल्दी अपने नित्य कर्मों से निजात पाकर लॉज से बाहर सडक पऱ एक निश्‍चित स्थान पर पहुचें जहां से हमें शहर दर्शन कराने वाली बस लेने आने वाली थी।

यात्रा आरम्भ हुआ, पूरे दिन हम लोगों ने चारमिनार ,गोलकुण्डा का किला, संग्रहालयों, पार्को इत्यादि को देखा, खुब मौज-मस्ती की । शाम होते ही यात्रा अपने अंतिम पडाव पर हुसैन सागर झिल के पास रूकी। बडा ही मनमोहक दृश्‍य था । वहॉं हुसैन सागर के किनारे के पर लगे स्ट्रीट लाइट मोती की माला की तरह प्रतित हो रही थी। हम लोंगों ने उस सुहाने मौसम में नौकायन का लुत्फ भी ऊठाया । भारी संख्या में लोग इस मनमोहक स्थल का लुत्फ ऊठाने के लिये आये हुए थे । तभी बस के कण्डक्टर ने बस में वापस आनें के लिये आवाज लगाई। हमें यह मनमोहक स्थान छोडने की इच्छा नही हो रही थी, अब तक हमें ज्ञात हो चुका था, कि यह यात्रा का अतिम स्थल है और इसके बाद बस वापस जाने वाली है, अतः हम सभी मित्रों ने बस छोड देने का निणर्य किया ताकी कुछ और समय रूक कर मनमोहक दृश्‍य का आनन्द उठाया जा सके ।

यह पता ही नहीं चला समय कैसे बीत गया और रात के ग्यारह बज गए। दिन भर का थकान के साथ-साथ भूख भी लगी थी। सो हम सभी मित्र पास के ही एक होटल में खाना खाकर वापस लॉज जाने के लिये आटोरिक्‍शा के आने का इंतजार करने लगे, इतने में एक डिजल इंजन वाली 6 सीटर ऑटोरिक्‍शा आयी । ऑटोवाले ने स्टेश्‍ान-स्टेशन की आवाज लगाई । रिक्‍शे में पीछे की सिटें बिलकुल खाली थी । इतना सूनना था कि हम लोग रिक्‍शे में कूद पडे। अब हम लोग आपस में बडे शहर की की कल्पना में खो गए और इसी के संबंध में विचार-विमर्श करने लगे। अब तक रिक्‍शेवाले ने अपना रिक्‍शा नहीं चालू किया और बचे हुए एक सीट के लिए आवाज देता रहा। इसी बीच एक अधेड़ सा व्यक्ति जो अत्यन्त मैली कुचेली लुंगी और बनियान पहने हुआ था , लडखडाते हुए रिक्च्चे में आ बैठा । उसके आते हमारा रिक्‍शा सोमरस की खुश्‍ाबू से महक पडा । उसकी उपस्थिति ने तो हमारे कल्पनालोक में विघ्न न तो डाल ही दिया साथ -साथ हमे साक्षात नर्क लोक का अनुभव भी करा दिया। किसी तरह रिक्‍शा आरम्भ हुआ। हम सभी मित्र उसकी उपस्थिति से अब तक सहज नहीं हो पाए थे और झल्लाहट में उसे हिन्दी में विभिन्न प्रकार के उपाधियों से नवाजने लगे अर्थात भद्दी-भद्दी गालिया देने लगे । उस व्यक्ति द्वारा कोई प्रतिक्रिया नहीं दर्शाए जाने पर तो हम लोग अपने आप को उस रिक्‍शे का मालिक ही समझाने लगे और पूर्ण जोश से उसके बारे में उपहासजनक छींटे कसने लगे।

इस बीच हमें पता चला कि हम लोग स्टेच्चन पहुंच गए हैं किन्तु स्टेशन का नजारा देखते ही हमारे पैरों तले जमीन खिसक गई क्योंकि रिक्‍शेवाले ने हमें स्टेश्‍ान की दूसरी और ला दिया था जहॉं से उस लॉज जिसमें हम लोग ठहरे थे, तक जाने का रास्ता हमें ज्ञात नहीं हो पा रहा था । अब तक रात के 12:30 बज गए थे। सड़क सूनसान हो गई थी । इस बीच रिक्‍शा वाले भी निकल चुका था। अब हम सभी मित्र लॉज पहुंचने के लिए सही रास्ते का अनुमान लगाते हुए बात-चीत करने लगे। घबराहट में यह बात-चीत जोरों से होने लगी।

इतने में हमारे साथ यात्रा करना वाला वह व्यक्ति, जो पूरी यात्रा के दौरान हमारे उपहास का पात्र बना हुआ था बोल पडा '' आप लोग का मुरगन लॉज जाने का है, तो आगे राइट गली से मुड़कर सीधा जाओ। आगे का चौराहा से लॉज दिखेगा। '' इतना सुनते ही हम सभी मित्र अवाक से रह गए। मैंने हिम्मत करके उससे पूछा '' क्या आप हिन्दी जानते हैं।' ' उसने पूर्ण दृढ़ता से उत्‍तर दिया '' हिन्दी हमारा राष्ट्रभाषा होता, हम हिन्दी क्यों नहीं जानता'' ।

2 टिप्‍पणियां:

  1. यह संस्‍मरण अत्‍यन्‍त प्रेरणादायी है । इसप्रकार के और भी संस्‍मरण व लेख पोस्‍ट करें। बहुत खुब, एक यादगार संस्‍मरण लिखने के लिए बहुत -बहुत धन्‍यवाद। विश्‍वजीतजी .........



    श्रीमती ममता एस. गुप्‍ता

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  2. achha anubhav banta hai aapne. Hindi ki seva to ham sab apne apne prakar se kar hi rahen hain. Aashavadi rahen ki Hindi ke bhi din firenge.

    rakesh sharma

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